भ्रष्टाचार खत्म करने वाला लोकपाल किधर है?

28th April 2017 | jansandesh.in

1968 से शुरू हुए लोकपाल कानून की मांग 45 साल बाद 2013 में पूरी हुई. पर 4 साल बाद भी आजतक लोकपाल नहीं बना. एक समय तो लग रहा था ये देश लोकपाल के बिना चलना-सोचना तक बंद कर देगा. पर सरकार और जनता दोनों ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया हैं. लोकपाल तो बना नहीं दो दिल्ली में दो महानुभव सरकार जरूर बना गए-केजरीवाल और मोदी. अन्ना जनाब का कोई अता-पता नहीं है. भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के घोषणा पत्र के पेज नंबर 9 पर लिखा था, '...हम एक प्रभावी लोकपाल संस्था गठित करेंगे, हर स्तर के भ्रष्टाचार से तीव्रता और कड़ाई से निपटा जाएगा.'

केजरीवाल औऱ मोदी सरकार शायद दोनों भूल गए हैं कि चुनाव से पहले दोनों भारत को करप्शन मुक्त करना चाहते थे, जबकि पिछले कई साल में भ्रष्टाचार का प्रतिशत पहले की तुलना में बढ़ा है. मोदी जी गुजरात के अपने पूरे कार्यकाल में कभी भी लोकपाल की नियुक्ति नहीं की.

28 मार्च को भी बहस हुई थी, कोर्ट में भारत सरकार के अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा था कि वर्तमान हालात में लोकपाल की नियुक्ति संभव नहीं है. ये वर्तमान हालात क्या हैं. सरकार की मुख्य दलील रही है कि विपक्ष का नेता नहीं है और बीस के करीब संशोधन करने हैं जो संसद में लंबित है. पिछले तीन साल में एक से एक मुश्किल कानून पास हुए हैं, जिस कानून को सभी राजनीतिक दलों ने पहले पास नहीं होने दिया, फिर मिलकर पास किया ताकि जनता को यह न लगे कि कोई भ्रष्टाचार के ख़िलाफ नहीं है तो उस कानून में एक मामूली सा संशोधन क्यों नहीं हो सका. 28 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने अपना पक्ष रखा था कि न्यायपालिका को अधिकारों के बंटवारे का सम्मान करना चाहिए और संसद को ये निर्देश जारी नहीं करने चाहिए कि वह लोकपाल की नियुक्ति करे. मगर 27 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने साफ साफ कह दिया कि लोकपाल की नियुक्ति के लिए कोई बहाना नहीं चलेगा. कुल मिलाकर लोकपाल नियुक्त न करने के जितने भी तर्क सरकार के थे, अदालत में नहीं टिक सके.

13 अप्रैल के इंडियन एक्सप्रेस में एक रिपोर्ट छपी थी. केंद्रीय संस्थाओं में भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने वाली संस्था केंद्रीय सतर्कता आयोग सीवीसी ने संसद में एक रिपोर्ट सौंपी. इसके अनुसार केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों के कर्मचारियों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार की शिकायतों में 67 प्रतिशत का उछाल आया है. भ्रष्टाचार की सबसे अधिक शिकायतें रेल मंत्रालय के कर्मचारियों के ख़िलाफ़ आईं हैं. रेलवे के कर्मचारियों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार की 11,000 शिकायतें आई हैं. गृहमंत्रालय के कर्मचारियों के ख़िलाफ 6,513 शिकायतें आईं हैं. बैंक कर्मचारियों के ख़िलाफ़ 6,018 शिकायतें आईं हैं. पेट्रोलियम मंत्रालय के कर्मचारियों के ख़िलाफ़ 2,496 शिकायतें आईं हैं. रक्षा मंत्रालय के कर्मचारियों के ख़िलाफ़ 689 शिकायतें आईं हैं.  ये केंद्रीय सतर्कता आयोग की रिपोर्ट है. जबकि सरकार के भ्रष्टाचार मुक्त होने का दावा किया जाता रहा है. अगर लोकपाल होता तो भ्रष्टाचार के दावों के बारे में स्वतंत्र रूप से पुष्टि हो सकती थी. संसद में पेश हुई केंद्रीय सतर्कता आयोग की रिपोर्ट के अनुसार भ्रष्टाचार की शिकायतों में एक साल के भीतर भंयकर उछाल आया है. 2015 में 29,838 शिकायतें दर्ज हुई थीं. 2016 में 49,847 शिकायतें दर्ज हुई हैं. एक साल में 67 फीसदी का उछाल आया.  यही नहीं, सीवीसी को तमाम राज्य सरकारों और अन्य संगठनों के अफसरों कर्मचारियों के खिलाफ भी बड़े पैमाने पर शिकायतें मिली हैं, इसमें भी 50 परसेंट का उछाल आया है. इन शिकायतों का निपटारा भी किया गया है. रेलवे के कर्मचारियों के ख़िलाफ़ 11,200 शिकायतें मिली थीं जिनमें से 8,852 का निपटारा कर दिया गया. लेकिन छह महीने से कर्मचारियों के ख़िलाफ़ 1,054 शिकायतें लंबित हैं. इस रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के कर्मचारियों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार की शिकायतों में कमी आई है. 2015 में 5,139 शिकायतें दर्ज हुई थीं, 2016 में घटकर 969 हो गई.

बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र में लिखा था कि प्रभावी लोकपाल संस्था गठित करेंगे लेकिन क्या 3 सालों में लोकपाल नियुक्त नहीं हुआ?

 



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