सुकमा नक्सली हमला: सरकार की खराब नीतियों के कारण जवानों को मौत के मुंह में धकेला जा रहा है

25th April 2017 | jansandesh.in

नक्सली हमलों से बचने के लिए सीआरपीएफ जवान बुलेटप्रूफ हेलमेट, जैकेट और एमपीवी वाहन जैसे जरूरी संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं. हाल के 2-3 वर्षों में नक्सली हमलों में सबसे जवानों की हत्या हुई हैं. सरकार इन हमलों में मरने वाले जवानों को शहीद का दर्जा नहीं देता. बल्कि भावनाओं के स्तर पर देशभर में उन्हें कहा भले ही शहीद जाता है, परंतु शहीद को मिलने वाली सुविधा उन्हें नहीं मिलती. एक लाख पच्चीस हजार हेलमेट की जरूरत है और 1800 हेलमेट से जवान काम चला रहे हैं. सरकार की नीतियां और सही रणनीति न अपनाने के कारण जवान अपनी जान गंवाने के लिए धकेले जा रहे हैं.

छत्तीसगढ़ में हुए नक्सली हमले के बाद केंद्र और राज्य सरकार ने हमेशा की तरह एक बार फिर तमाम किस्म के दावे करने शुरू कर दिए हैं. बस्तर ,सुकमा आदि में हमेशा की तरह इन दावों की धज्जियाँ उड़नी तय है. दरअसल इन हमलों के पीछे बहुत कुछ ऐसा छिपा है जिसे देश की जनता और फेसबुक के बयानबाज बिलकुल नहीं जानते ,मगर जरुरी है कि इन हमलों के निहितार्थ को समझा जाए. आइये जानते हैं छत्तीसगढ़ में आतंक के इस दौर के खात्मे में दिक्कत कहाँ से है-

१- छत्तीसगढ़ में नक्सल विरोधी आपरेशन पूरी तरह से अर्ध सैनिक बलों के जिम्मे है यह वो बल है जिन्हें न तो भूगोल की जानकारी है न ही नक्सलियों के खिलाफ काउंटर इंसरजेंसी आपरेशन करने की तकनीक की.

२ - आपरेशन में लीड हमेशा राज्य पुलिस को करना चाहिए जो कि राज्य के भूगोल और सामाजिक ताने बाने को समझतीहै, लेकिन होता उल्टा है लीड सीआरपीऍफ़ करती है. मरता भी अर्द्धसैनिक बल का जवान है पुलिस का नहीं

३- अर्धसैनिक बलों की कमान आईपीएस अधिकारियों को सौंपी गई है जो कि सामरिक समझ नहीं के बराबर रखते हैं.

४- कल्लूरी जैसे अधिकारियों की वजह से आदिवासी ग्रामीणों के बीच सुरक्षा बलों ने अपना विश्वास खो दिया है इसलिए न तो उन्हें इंटेलिजेंस से जुडी सूचनाएं मिल पाती हहै और न वो एरिया डोमिनेट कर पाते हैं

५- छत्तीसगढ़ में जो भी वारदातें हो रही है वो तेलंगाना या आन्ध्र प्रदेश से आये नक्सली कर रहे हैं ,दिलचस्प यह है कि आन्ध्र और तेलंगाना में इस साल एक भी घटना नहीं घटी है,इसका मतलब साफ़ है सीमाओं की सुरक्षा ठीक ढंग से नहीं हो रही.



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